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Article 9 of the Constitution of India

Article 9 of the Constitution of India: Prohibition of Dual Citizenship and the Principle of Single Allegiance Citizenship defines the legal bond between an individual and the State. It determines who belongs to the political community of India and who is entitled to constitutional rights, political participation, and civic protection. Article 9 of the Constitution of India plays a crucial role in maintaining the clarity and integrity of Indian citizenship. It lays down a clear constitutional rule: a person who voluntarily acquires the citizenship of a foreign country cannot remain an Indian citizen . This provision matters deeply to Indian citizens, especially in an era of global migration, overseas employment, and international education. Many Indians live abroad, and decisions related to foreign nationality have serious constitutional consequences. Historically, Article 9 reflects the framers’ commitment to a single and undivided national allegiance , which they believed was essent...

Basic Structure of Indian Constitution in Hindi

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भारत के संविधान (Constitution of India) की संरचना बहुत व्यवस्थित है। इसे भाग (Parts) , अनुच्छेद (Articles) , अनुसूचियाँ (Schedules) , परिशिष्ट (Appendices) आदि में बाँटा गया है। नीचे मैं हम   भारत के संविधान के सभी भागों, अनुच्छेदों की संख्या, अनुसूचियों और महत्वपूर्ण संशोधन आदि का संक्षिप्त लेकिन पूरा विवरण साँझा कर रहा हूँ। जिसे आप लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं। 1. संविधान के भाग (Parts of Constitution) वर्तमान में 22 भाग हैं (कुछ भाग बाद में जोड़े गए या हटाए गए): भाग विषय I संघ और उसके राज्यक्षेत्र (Union & its Territory) – अनुच्छेद 1-4 II नागरिकता (Citizenship) – अनुच्छेद 5-11 III मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) – अनुच्छेद 12-35 IV नीति-निर्देशक तत्त्व (DPSPs) – अनुच्छेद 36-51 IV-A मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) – अनुच्छेद 51A V संघ (The Union) – अनुच्छेद 52-151 VI राज्य (The States) – अनुच्छेद 152-237 VII (हटा दिया गया) – 'B' श्रेणी के राज्य VIII संघ राज्यक्षेत्र (Union Territories) – अनुच्छेद 239-242 IX पंचायतें (Panchayats) – अनुच्छेद 243-243O IX-A नगरपा...

Article 8 - Rights of citizenship of certain persons of Indian origin residing outside India

  क्या आप कभी सोचे हैं कि अगर आपके दादा-परदादा अविभाजित भारत में पैदा हुए थे, और आप विदेश में रहते हैं, तो क्या आज भी आप भारतीय नागरिक बन सकते हैं सिर्फ़ अनुच्छेद 8 के आधार पर? 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का साफ़ जवाब दे दिया – नहीं बन सकते। लेकिन ये अनुच्छेद था क्या? क्यों बनाया गया? और अब ये बंद क्यों हो गया? आज की इस पोस्ट में हम अनुच्छेद 8 को बहुत ही आसान हिंदी में, बिल्कुल घर की बात की तरह समझेंगे। चाहे आप लॉ स्टूडेंट हों, वकील हों या आम नागरिक जो अपने अधिकार जानना चाहते हैं – सबके लिए उपयोगी है। चलिए शुरू करते हैं! 1. अनुच्छेद 8 आया कहाँ से? ऐतिहासिक कहानी 1947 में आज़ादी मिली। उस समय लाखों भारतीय बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, अफ्रीका, फिजी, मॉरीशस – हर जगह बसे हुए थे। इनमें से बहुत से लोग सदियों से वहाँ थे, लेकिन दिल से भारत से जुड़े थे। संविधान सभा के सामने सवाल था – अनुच्छेद 5 तो भारत में रहने वालों की नागरिकता की बात करता है अनुच्छेद 6-7 पाकिस्तान से आए लोगों की बात करते हैं लेकिन विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोग? उनके लिए कुछ नहीं था। इसलिए 10-12 अगस्त 1...

Article 7 - Rights of citizenship of certain migrants to Pakistan

1947 का बंटवारा कोई किताबी बात नहीं थी। रातों-रात लाखों लोग अपना घर, खेत, दुकान छोड़कर भागे। ट्रेनें खून से भर गईं, गांव खाली हो गए। उस वक्त सबसे बड़ा सवाल था – अब भारत का नागरिक कौन रहेगा? कौन पाकिस्तानी कहलाएगा? इसी सवाल का सबसे सख्त और साफ जवाब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 7 में दिया गया है। यह अनुच्छेद बहुत छोटा है, लेकिन इसका असर आज भी कुछ परिवारों पर पड़ता है। आज हम इसे बिल्कुल घर की भाषा में समझेंगे – न ज्यादा कानूनी शब्द, न उलझन। कानून के स्टूडेंट्स और वकीलों के लिए जरूरी पॉइंट्स भी डालेंगे, लेकिन भाषा ऐसी रखेंगे कि दादी-नानी भी समझ जाएं। अनुच्छेद 7 असल में क्या कहता है? (पूरा पाठ सरल भाषा में) संविधान का मूल पाठ यह है – अनुच्छेद 5 और 6 में कुछ भी लिखा हो, उससे फर्क नहीं पड़ता। अगर कोई शख्स 1 मार्च 1947 के बाद भारत से उस इलाके में चला गया जो अब पाकिस्तान है, तो उसे भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा। लेकिन अगर वही शख्स बाद में पुनर्वास या स्थायी वापसी का सरकारी परमिट लेकर भारत लौट आया, तो उस पर यह नियम नहीं लागू होगा। उसे ऐसा मान लिया जाएगा जैसे वह 19 जुलाई 1948 के बाद भारत आया हो और...

Article 6 - Rights of citizenship of certain persons who have migrated to India from Pakistan

  1947 का वो भयावह दौर जब ट्रेनें खून से लाल हो रही थीं, परिवार एक पल में बिखर जा रहे थे, और लाखों लोग रातों-रात बेघर हो गए। पाकिस्तान से भारत आए ये लोग कौन थे। क्या वे अपने नए घर में सचमुच नाग्वासियों की तरह नागरिक कहलाएंगे। यही वो सवाल था जिसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 6 को जन्म दिया। ये अनुच्छेद सिर्फ एक कानूनी नियम नहीं है, बल्कि विभाजन की त्रासदी में करुणा की एक जीती-जागती मिसाल है। आज हम इसे सरल हिंदी में समझेंगे, बिलकुल घर में बैठकर बात करने की तरह। चाहे आप कानून के छात्र हों, वकील हों, प्रोफेसर हों, या बस एक जिज्ञासु नागरिक जो अपने अधिकार जानना चाहता है, ये लेख आपके लिए है। हम ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर कानूनी शब्दों की आसान व्याख्या तक, संविधान सभा की बहसों से लेकर अदालती फैसलों तक, और तीन वास्तविक जीवन की कहानियों तक सब कुछ कवर करेंगे। कुल चार हजार शब्दों में पूरी कहानी सामने आएगी। परिचय: विभाजन की आग में जन्मी नागरिकता की गारंटी साल 1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। पंद्रह अगस्त को आजादी मिली, लेकिन उस आजादी की कीमत चुकानी पड़ी लाखों लोगों की जान और करोड़ों ...

सरदार वल्लभभाई पटेल : भारत के लौह पुरुष (Sardar Vallabh Bhai Patel)

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भारत जब आज़ादी की देहरी पर खड़ा था, तब दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिनके कंधों पर सबसे भारी ज़िम्मेदारी थी – एक थे महात्मा गांधी, जिन्होंने देश को आत्मा दी, और दूसरे थे सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्होंने उस आत्मा को एक मजबूत, अखंड शरीर प्रदान किया। यदि गांधीजी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्राण थे, तो सरदार पटेल उसके हृदय और मस्तिष्क थे। इतिहास में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के पहले और स्वतंत्रता के तुरंत बाद, दोनों ही समय में इतनी निर्णायक भूमिका निभाई हो। सरदार पटेल उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से हैं जिन्हें भारत माता ने दो बार जन्म दिया – एक बार 31 अक्टूबर 1875 को नडियाद में, और दूसरी बार 1928 में बारडोली के मैदान में, जब बारडोली की महिलाओं ने उन्हें “सरदार” कहा। आज जब हम “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की बात करते हैं, तो उसकी नींव में सरदार पटेल का खून, पसीना और लौह इरादा लगा हुआ है। यह जीवनी उसी लौह पुरुष की है, जिसने 565 रियासतों को एक सूत्र में बांधकर यह सिद्ध कर दिया कि भारत को कोई तोड़ नहीं सकता। 1. प्रारंभिक जीवन : लौह इरादों की पहली चिंगारी प्रारंभिक जीवन : लौह इरादों की पहल...

Article 4 - Constitution of India

Laws made under articles 2 and 3 to provide for the amendment of the First and the Fourth Schedules and supplemental, incidental and consequential matters - Constitution of India भारतीय संविधान एक स्थिर दस्तावेज नहीं, बल्कि समय के साथ बदलती जरूरतों को अनुकूलित करने वाला जीवंत ढांचा है। अनुच्छेद 4 इसी जीवंतता का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखा हिस्सा है, जो संसद को नए राज्यों का निर्माण या मौजूदा राज्यों की सीमाओं, क्षेत्रों और नामों में बदलाव करने की प्रक्रिया को सरल बनाता है। यह अनुच्छेद सीधे शक्ति नहीं देता, बल्कि अनुच्छेद 2 (नए राज्यों का प्रवेश) और अनुच्छेद 3 (मौजूदा राज्यों का पुनर्गठन) के तहत बनने वाले कानूनों को प्रभावी बनाने का तंत्र प्रदान करता है। कल्पना कीजिए कि अनुच्छेद 3 संसद को पेंसिल देता है भारत का नक्शा बदलने के लिए, तो अनुच्छेद 4 वह रबर है जो बदलाव को साफ-सुथरा और संवैधानिक रूप से वैध बनाता है। इस अनुच्छेद के बिना, हर राज्य पुनर्गठन के लिए अनुच्छेद 368 के तहत पूर्ण संवैधानिक संशोधन की जरूरत पड़ती, जो विशेष बहुमत और जटिल प्रक्रिया मांगता। अनुच्छेद 4 इसे साधारण ...

Article 5 : Citizenship at the commencement of the Constitution

  भारतीय संविधान ने 26 जनवरी 1950 को लागू होने पर नागरिकता के स्पष्ट नियम दिए। अनुच्छेद 5 ने लाखों लोगों को भारत का नागरिक बनाया, लेकिन इसमें धर्म या जाति का कोई भेदभाव नहीं था। प्रस्तावना भारतीय संविधान का अनुच्छेद 5 बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि संविधान लागू होने के समय कौन-कौन भारत का नागरिक माना जाएगा। 1947 में देश का विभाजन हुआ था, लाखों लोग इधर-उधर हुए। ऐसे में नागरिकता का सवाल बड़ा था। अनुच्छेद 5 ने तीन मुख्य आधार दिए: भारत में जन्म, माता-पिता में से किसी का भारत में जन्म, या पांच साल का निवास। लेकिन इसके लिए भारत में अधिवास यानी स्थायी घर होना जरूरी था। यह अनुच्छेद सिर्फ ऐतिहासिक नहीं है। आज भी यह नागरिकता के कानूनों की नींव है। संविधान सभा में इस पर तीन दिन बहस हुई। सदस्यों ने धर्म के आधार पर नागरिकता देने का सुझाव दिया, लेकिन सभा ने इसे खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि नागरिकता न्याय और समानता पर आधारित होनी चाहिए, न कि धर्म पर। दोहरी नागरिकता का प्रस्ताव भी ठुकराया गया। अमेरिका के कानून से तुलना में इसे ज्यादा सख्त बताया गया। शोधकर्ताओं के लिए यह अनुच्छेद द...